कहानी बदलाव की: बांधवगढ़ में बढ़ रहा गौर का कुनबा

🟨 बड़े शाकाहारी वन्यजीव जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में निभाते हैं महत्वपूर्ण भूमिका

📅 दिनांक: 22 सितंबर 2026
📍 स्थान: बांधवगढ़, उमरिया, मध्यप्रदेश

उमरिया। मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी बांधवगढ़ से विलुप्त हो चुका गौर (इंडियन बायसन) आज एक बार फिर यहां के जंगलों में अपनी संख्या बढ़ा रहा है। बड़े शाकाहारी वन्यजीवों के संरक्षण और पुनर्स्थापना के प्रयासों के बीच बांधवगढ़ में गौर के कुनबे का बढ़ना वन्यजीव संरक्षण की एक उल्लेखनीय कहानी बनकर सामने आया है।

🟩 बांधवगढ़ से 1998 में विलुप्त हो गया था गौर

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक श्री अनुपम सहाय के अनुसार गौर, जिसे भारतीय बायसन भी कहा जाता है, एशिया का सबसे बड़ा जंगली गौवंश है। बांधवगढ़ में गौर वर्ष 1998 में विलुप्त हो गया था। इसके बाद इसे पुनः बांधवगढ़ के जंगलों में स्थापित करने के प्रयास शुरू किए गए।

🟧 कान्हा से लाए गए 50 गौर

गौर की आबादी को पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से वर्ष 2011-12 में कान्हा से 50 गौर बांधवगढ़ लाए गए। उन्हें उपयुक्त वन क्षेत्र में छोड़ा गया और संरक्षण एवं निगरानी के प्रयास लगातार जारी रखे गए।

इन प्रयासों का परिणाम यह रहा कि बांधवगढ़ में गौर की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती गई और यह लगभग 170 तक पहुंच गई। यह वृद्धि बांधवगढ़ में गौर के सफल पुनर्स्थापना प्रयासों की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

🟥 आनुवंशिक विविधता बनाए रखने पर भी जोर

बांधवगढ़ में गौर की आबादी को मजबूत करने के साथ-साथ आनुवंशिक विविधता बनाए रखने पर भी ध्यान दिया जा रहा है। इसी उद्देश्य से सतपुड़ा क्षेत्र से भी गौर लाने की प्रक्रिया के माध्यम से आबादी में आनुवंशिक विविधता को बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

🟨 गौर और वन भैंसा अलग-अलग प्रजातियां

गौर और वन भैंसा देखने में कुछ हद तक समान दिखाई दे सकते हैं, लेकिन दोनों अलग-अलग प्रजातियों से संबंधित हैं। इनके आवास, खान-पान और प्राकृतिक व्यवहार में भी अंतर पाया जाता है। गौर अपने विशाल शरीर, मजबूत कद-काठी और विशिष्ट बनावट के कारण जंगल के प्रमुख बड़े शाकाहारी वन्यजीवों में शामिल है।

🟩 जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण भूमिका

बड़े शाकाहारी वन्यजीव जंगल के पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। वे वनस्पतियों पर निर्भर रहने के साथ-साथ जंगल में वनस्पति के फैलाव, बीजों के प्रसार और खाद्य श्रृंखला के संतुलन में योगदान देते हैं। यही कारण है कि बाघ जैसे शीर्ष शिकारी के संरक्षण के साथ-साथ उनके प्राकृतिक आवास में मौजूद बड़े शाकाहारी वन्यजीवों का संरक्षण भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

🟦 बांधवगढ़ में संरक्षण की नई तस्वीर

गौर का बांधवगढ़ में दोबारा स्थापित होना केवल एक वन्यजीव की संख्या बढ़ने की कहानी नहीं है, बल्कि यह संरक्षण, पुनर्स्थापना और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के प्रयासों की कहानी भी है।

1998 में बांधवगढ़ से विलुप्त हो चुका गौर आज उसी जंगल में फिर से अपना कुनबा बढ़ा रहा है। कान्हा से शुरू हुई पुनर्स्थापना की पहल ने आने वाले वर्षों में गौर की आबादी को नई दिशा दी है। सतपुड़ा से आनुवंशिक विविधता बढ़ाने के प्रयास इस संरक्षण यात्रा को और महत्वपूर्ण बनाते हैं।

🟥 विलुप्ति से वापसी तक—गौर की यह कहानी बांधवगढ़ के जंगलों में संरक्षण के बदलते स्वरूप और वन्यजीवों के लिए सुरक्षित प्राकृतिक आवास तैयार करने की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की कहानी है।

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