
पानी संकट से जूझ रहे नगर परिषद मानपुर वार्ड 10 के रहवासी: नल बंद तो हैंडपंप भी दे रहे जवाब
मानपुर। नगर परिषद मानपुर के वार्ड क्रमांक 10 में जल संकट अब विकराल रूप धारण कर चुका है। भीषण गर्मी की तपिश के बीच यहाँ ‘त्राहि-त्राहि’ का आलम है। एक ओर जहाँ दावों के विपरीत घरों में नलों से नियमित और पर्याप्त पानी नहीं पहुंच रहा है, वहीं दूसरी ओर वार्ड में स्थापित सरकारी हैंडपंप भी अब भूजल स्तर गिरने से ‘हवा फेंक रहे हैं’। इस दोहरे संकट ने स्थानीय रहवासियों के सब्र का बांध तोड़ दिया है और उनकी दैनिक परेशानियां कई गुना बढ़ गई हैं।
बूंद-बूंद को तरसती जनता, दूर-दराज से पानी लाने की मजबूरी
भीषण गर्मी के इस दौर में लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए ‘दर-दर की ठोकरें’ खाने को मजबूर हैं। पानी के इंतजाम के लिए महिलाओं, बुजुर्गों और मासूम बच्चों को इस चिलचिलाती धूप में दूर-दराज के क्षेत्रों और निजी कुओं की ओर रुख करना पड़ रहा है। वार्डवासियों का आक्रोशित होकर कहना है कि जब सरकारी नलजल व्यवस्था पूरी तरह ठप है और हैंडपंप भी दम तोड़ चुके हैं, तो आखिर आम जनता इस ‘अघोषित आपातकाल’ जैसी स्थिति में जाए तो जाए कहाँ?
शिकायतों के बाद भी नहीं जागा कुंभकर्णी नींद में सोया प्रशासन
स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों—गोपाल गुप्ता, रामदास चौधरी एवं रामप्रसाद प्रजापति ने ‘ग्राउंड जीरो’ पर अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि वार्ड में पिछले काफी समय से पानी की यह गंभीर समस्या बनी हुई है। नलों से नियमित जलापूर्ति न होना और खराब पड़े हैंडपंपों की सुध न लेना, नगर परिषद की ‘घोर लापरवाही’ को उजागर करता है। नागरिकों का कहना है कि सीएम हेल्पलाइन और स्थानीय स्तर पर कई बार लिखित शिकायत दर्ज कराने के बावजूद, जिम्मेदार अधिकारियों ने अब तक इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।
परियोजना का हस्तांतरण बना जी का जंजाल
इनसाइड स्टोरी: आपको बता दें कि नगर परिषद मानपुर में जलापूर्ति का जिम्मा पहले ‘जल निगम’ के पास था। लेकिन लगभग एक वर्ष पूर्व इस महत्वाकांक्षी परियोजना को नगर परिषद मानपुर को हैंडओवर (हस्तांतरित) कर दिया गया। इस प्रशासनिक फेरबदल के बाद से ही नगर की व्यवस्था ‘पटरी से उतर गई’ है। स्थानीय तकनीकी जानकारों के अनुसार, मुख्य पाइपलाइन में कई प्रमुख स्थानों पर भारी लीकेज (रिसाव) है, जिसकी वजह से पानी का पर्याप्त प्रेशर (दबाव) नहीं बन पा रहा है और टेल-एंड (अंतिम छोर) के क्षेत्रों तक पानी पहुंच ही नहीं रहा।
पानी नदारद, लेकिन हजारों के ‘जलकर’ बिल से भड़का आक्रोश
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जहाँ एक तरफ वार्डवासी एक-एक मटके पानी के लिए तरस रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नगर परिषद द्वारा उन्हें 1200 रुपये से लेकर हजारों रुपये तक के जलकर (Water Tax) के भारी-भरकम बिल थमाए जा रहे हैं। बिना सेवा दिए वसूली के इस तुगलकी फरमान से जनता में नाराजगी और आक्रोश दोनों चरम पर हैं। सजग नागरिकों ने तीखा सवाल उठाया है कि:
• जब मूलभूत सुविधा (पानी) ही उपलब्ध नहीं कराई जा रही, तो यह आर्थिक वसूली किस आधार पर की जा रही है?
• क्या जनता केवल बिल भरने के लिए है, सुविधाएं पाने के लिए नहीं?
अधिकारियों की उदासीनता: एसी कमरों से बाहर नहीं निकल रहा अमला
रहवासियों का सीधा आरोप है कि जल संकट की इतनी बड़ी गूंज के बाद भी किसी भी जिम्मेदार अधिकारी ने मौके पर पहुंचकर जमीनी हकीकत (Ground Reality) की तस्दीक करने की जहमत नहीं उठाई। अमला केवल कागजी घोड़े दौड़ाने में व्यस्त है, जबकि धरातल पर लीकेज पाइपलाइन और सूखे हैंडपंपों के कारण संकट हर दिन गहराता जा रहा है।
कलेक्टर और जनप्रिया विधायिका से न्याय की गुहार
वार्ड के त्रस्त निवासियों ने अब इस मामले में उच्च स्तरीय हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने जिले की संवेदनशील कलेक्टर महोदया, अनुभागीय अधिकारी (एसडीएम) एवं क्षेत्र की लोकप्रिय विधायिका से पुरजोर अपील की है कि वे इस जनहित के मुद्दे को संज्ञान में लें और वार्ड 10 सहित सभी प्रभावित क्षेत्रों में टैंकरों के माध्यम से वैकल्पिक और पाइपलाइन सुधार कर स्थायी जलापूर्ति सुनिश्चित कराएं।
बड़ा सवाल:
अब सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यही है कि इस रिकॉर्ड तोड़ गर्मी में जब पानी जैसी अत्यंत बुनियादी जरूरत पूरी नहीं हो पा रही, तब ‘कुंभकर्णी नींद’ में सोया जिम्मेदार प्रशासनिक तंत्र आखिर कब जागेगा? क्या अधिकारियों की आंखें किसी बड़ी अनहोनी के बाद खुलेंगी? जनता अब खोखले आश्वासनों से थक चुकी है, उसे धरातल पर तुरंत ‘समाधान’ चाहिए।










